Saturday, 25 March 2017

कागज

हवा में  उड़ते  कागज  को  जब  देखता  हूँ
तो  सोच  में  पढ़ जाता  हूँ ,
की  क्या  ये  लवारीस  सा  ज़्होके  में झूलता कागज़  वही  है ,
जिसपे जहाज  बना  कर , बचपन  उदाया था,
या  ये  वो  है  जिसपे  अपने  मासूम  से  सपनो को  सजाया  था,
कहीं  ये  वो  कागज़  तो  नहीं ,
जिसपे  अपने  इज़हार-ऐ-इश्क़ को,
दिल की स्याही से  लिख के  आया  था ,

सोच ही  सोच में ये भी  सोच  जाता  हूँ,
क्या  ये  पन्ना वो  तो  नहीं ,
जिसपे खुद से खुद की उम्मीदों का ज़िक्र कर के आया था,
या  ये  वो  पन्ना  है ,
जिसपे  में दर्दो  को  ग़मों  को  लिख  फेंक आया  था,

सोचता  हूँ  पकड़  के  देख  लूँ ,
ये  ज़्होंका फिर क्या  ले  आया  था,

फिर सोचता हूँ उड़ ही जाने दो इस कागज़  को ,
बीते लम्हे को पड़के क्या  मिल  पायेगा ,
जानता हूँ समय की चाल को,
ये फिर से सामने कोरा  कागज़ लाएगा,
होगें कई  नए  किस्से,
बीतता लम्हा फिर से कुछ लिखवाएगा,
अगला ही ज़्होंका उसे भी उड़ा ले  जायेगा !

© Abhishek Shukla, The Voice of Heart:कागज़