Sunday, 13 September 2015

क्‍यूँ ना हम मिले उन्ही राहों मे

क्‍यूँ ना हम मिले उन्ही राहों मे
दो अजनबी से
ना कोई खबों पे बंदिशें हो
ना परवाह हो किसी की




क्‍यूँ ना चले सफ़र मैं
हमनवां से
ना कल का दर हो
बस आरज़ू हो पाकीज़ा सी

क्‍यूँ ना रवाँ हो एक दूसरे की
चाहतों से
ना बेगानेपन का आलम हो
बस हो आशिकी बेपनाह सी

क्यू ना यूँ फन्ना हों
एक दूसरे मे
की बस एक दूसरे की सोहबत के सपने हों
ओर दिल मे बस मंज़िल हो आशियाँ सी


© Abhishek Shukla, The Voice of Heart:क्‍यूँ ना हम मिले उन्ही राहों मे


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